क्लिनिकल डेटा की गुणवत्ता: स्वास्थ्य सेवा में AI की शुरुआत साफ़-सुथरे रिकॉर्ड से क्यों होती है
अधूरे, आपस में मेल न खाने वाले या ग़लत कोड किए गए रिकॉर्ड AI को भरोसे लायक नहीं रहने देते। क्लिनिकल डेटा की गुणवत्ता कैसे मापें, यह कहां बिगड़ती है, और इसे स्रोत पर ही कैसे ठीक करें।
यह अंग्रेज़ी में लिखे गए एक लेख का अनुवाद है। अगर यहां कोई बात अलग लगे, तो अंग्रेज़ी संस्करण को ही सही माना जाए।
स्वास्थ्य सेवा में आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस (AI) से जुड़ा हर वादा एक ऐसी धारणा पर टिका है जिसे शायद ही कभी खुलकर कहा जाता है: कि AI जो रिकॉर्ड पढ़ता है, वे सही हैं। नोट का मसौदा लिखने वाला स्क्राइब (scribe), बिगड़ती हालत वाले मरीज़ की ओर ध्यान दिलाने वाला मॉडल (model), हज़ारों मरीज़ों में दो इलाजों की तुलना करने वाला अध्ययन: इनमें से हर एक उतना ही अच्छा है जितना उसके नीचे का डेटा (data)।
ज़्यादातर अस्पतालों में यह डेटा किसी के अंदाज़े से भी ज़्यादा ख़राब है, और किसी ने इसे मापा नहीं है। यह लेख बताता है कि क्लिनिकल डेटा की गुणवत्ता का मतलब क्या है, इसे कैसे मापें, भारतीय अस्पतालों और क्लिनिकों में यह कहां बिगड़ती है, और इसे स्रोत पर ही कैसे ठीक करें।
क्लिनिकल रिकॉर्ड के लिए “डेटा की गुणवत्ता” का मतलब क्या है
इलेक्ट्रॉनिक हेल्थ रिकॉर्ड (electronic health record, EHR) के डेटा का अध्ययन करने वाले शोधकर्ताओं ने इस विचार को ठीक-ठीक परिभाषित करने की कोशिश की है। 2013 में Weiskopf और Weng की एक समीक्षा, जिसका व्यापक रूप से हवाला दिया जाता है, ने 95 अध्ययनों को देखा, उनमें इस्तेमाल हो रहे 27 अलग-अलग शब्द पाए, और उन्हें पांच आयामों में समेट दिया:
- पूर्णता (Completeness): मरीज़ के बारे में जो तथ्य रिकॉर्ड में होना चाहिए, क्या वह सचमुच वहां है?
- शुद्धता (Correctness): जो दर्ज है, क्या वह सच है?
- सामंजस्य (Concordance): क्या रिकॉर्ड के अलग-अलग हिस्से आपस में, और दूसरे स्रोतों से मेल खाते हैं?
- विश्वसनीयता (Plausibility): जो कुछ हम जानते हैं, उस सबको देखते हुए क्या कोई मान समझ में आता है?
- सामयिकता (Currency): क्या रिकॉर्ड मरीज़ की वही स्थिति दिखाता है जो उस समय थी जिसका वह दावा करता है?
बाद में, 2016 में Kahn और उनके साथियों के एक ढांचे (framework) ने जांचों को तीन श्रेणियों में बांटा, जो उन परीक्षणों से सीधे मेल खाती हैं जिन्हें आप सचमुच चला सकते हैं:
- अनुरूपता (Conformance): क्या मान तय फ़ॉर्मेट, कोड सेट और आपसी संबंधों का पालन करते हैं? तारीख़ की जगह सचमुच एक तारीख़, ऐसा डायग्नोसिस जो एक मान्य ICD-10 कोड हो, ऐसे ऑर्डर से जुड़ा लैब रिज़ल्ट जो वाक़ई मौजूद हो।
- पूर्णता (Completeness): कोई फ़ील्ड कुल मिलाकर कितनी बार भरा जाता है?
- विश्वसनीयता (Plausibility): क्या मान भरोसे लायक हैं? 720 की पल्स, भर्ती से पहले की छुट्टी (डिस्चार्ज), गर्भवती के रूप में दर्ज एक पुरुष।
उसी पेपर में सत्यापन (verification: डेटा को अपने ही नियमों और अपेक्षाओं से जांचना) और पुष्टि (validation: इसे किसी बाहरी संदर्भ से जांचना, जैसे काग़ज़ी केस नोट्स या कोई दूसरा सिस्टम) को अलग-अलग रखा गया है। दोनों ज़रूरी हैं। सत्यापन सस्ता है और अपने आप होता है; पुष्टि धीमी है और वह पकड़ती है जो नियम नहीं पकड़ सकते।
क्लिनिकल डेटा कहां बिगड़ता है
ज़्यादातर समस्याएं मामूली होती हैं, और ज़्यादातर डेटा दर्ज करने के पल में ही पैदा होती हैं।
काग़ज़ और खुला टेक्स्ट (free text)। एक वाक्य में लिखा डायग्नोसिस, फ़ोटो खींचा गया पर्चा, स्कैन की गई डिस्चार्ज समरी। इंसान इसे पढ़ सकता है, लेकिन किसी क्वेरी (query) को यह दिखता ही नहीं।
एक ही मरीज़ दो बार। एक मरीज़ मार्च में “एस. कुमार” और जून में नए फ़ोन नंबर के साथ “सुरेश कुमार” के नाम से रजिस्टर होता है। उसका इतिहास दो रिकॉर्ड में बंट जाता है, और इनमें से किसी को भी देखने वाले को आधा ही दिखता है।
यूनिट और दशमलव की चूक। किलोग्राम वाले फ़ील्ड में पाउंड में लिखा वज़न, 2.50 की जगह 250 दर्ज लेंस पावर, लैब की रिपोर्ट 11.5 g/dL होने पर भी 115 दर्ज किया गया हीमोग्लोबिन।
ढीली कोडिंग। सही ICD-10 कोड ढूंढने में समय लगता है, इसलिए कोई ज़्यादा अस्पष्ट कोड चुन लिया जाता है, या कोई भी नहीं। ब्रिटेन (UK) के 32 अध्ययनों की एक व्यवस्थित समीक्षा में पाया गया कि केस नोट्स से मिलाने पर डायग्नोसिस कोडिंग की माध्यिका (median) सटीकता 80.3% थी, और अलग-अलग अध्ययनों में यह 50.5% से 97.8% तक थी। जब अस्पतालों को मिलने वाला भुगतान इस पर निर्भर होने लगा, तो सटीकता तेज़ी से बढ़ी, जो इस बारे में कुछ कहता है कि कोडिंग किस वजह से सुधरती है। भारतीय अस्पतालों में डिस्चार्ज कोडिंग के लिए ऐसा कोई प्रकाशित आंकड़ा हमारी जानकारी में नहीं है, लेकिन उत्तर भारत के एक टर्शियरी (tertiary) अस्पताल में 2025 के एक अध्ययन में पाया गया कि 1,147 मृत्यु-कारण प्रमाणपत्रों में से लगभग 10 में से 1 ही सही ढंग से भरा गया था।
कॉपी-फ़ॉरवर्ड (copy-forward)। कल की जांच आज के नोट में ज्यों की त्यों उठाकर डाल दी जाती है, क्योंकि नया लिखने से यह जल्दी होता है। रिकॉर्ड पूरा दिखता है, पर पुराना पड़ चुका होता है।
छूटे हुए ‘नहीं’। जब फ़ील्ड बस ख़ाली छोड़ दिया जाता है, तो “कोई ज्ञात एलर्जी नहीं” और “एलर्जी के बारे में पूछा नहीं गया” एक जैसे दिखते हैं।
इसे कैसे मापें
जिसे आपने मापा ही नहीं, उसे आप ठीक नहीं कर सकते, और शुरुआत के लिए आपको डेटा वेयरहाउस (data warehouse) की ज़रूरत नहीं है। वह उपयोग चुनें जो आपके लिए मायने रखता है, फिर वे गिने-चुने फ़ील्ड जिन पर वह उपयोग निर्भर है, और मापें:
- पूर्णता: उन विज़िट का हिस्सा जिनमें हर मुख्य फ़ील्ड भरा है: एलर्जी, वाइटल्स, डायग्नोसिस, दवाइयां, फ़ॉलो-अप की तारीख़।
- अनुरूपता: उन डायग्नोसिस का हिस्सा जो मान्य ICD-10 कोड हैं, मानक कोड से जुड़े लैब टेस्ट, दायरे में आने वाली तारीख़ें, FHIR वैलिडेटर (validator) पर खरे उतरने वाले रिकॉर्ड।
- विश्वसनीयता: क्लिनिकल दायरे से बाहर के मान, तारीख़ों के असंभव क्रम, और विरोधाभास, जैसे ग़लत लिंग वाले मरीज़ पर दर्ज कोई डायग्नोसिस।
- डुप्लिकेट: एक ही फ़ोन नंबर और मिलते-जुलते नाम वाले मरीज़, या एक ही नाम और जन्मतिथि वाले।
- कोडिंग की सटीकता: कोड किए गए डायग्नोसिस का एक नमूना, जिसे उस विशेषज्ञता को जानने वाला कोई व्यक्ति नोट्स से मिलाकर जांचे।
- समयबद्धता (Timeliness): विज़िट के कितनी देर बाद रिकॉर्ड पूरा होता है।
एक बार यह करके आधार-रेखा (baseline) बना लें, फिर इसे तय समय पर दोहराते रहें। जो आंकड़ा फिर कभी मापा नहीं जाता, वह सुधरता नहीं।
स्रोत पर ही ठीक करें
बाद में डेटा साफ़ करना धीमा है, और अक्सर नामुमकिन, क्योंकि तब तक किसी को याद नहीं रहता कि सही मान क्या था। सस्ता उपाय यह है कि सही प्रविष्टि को ही आसान बना दिया जाए:
- स्ट्रक्चर्ड फ़ील्ड उन चीज़ों के लिए जिन्हें बाद में गिना जाएगा: डायग्नोसिस, दवाइयां, वाइटल्स, रिज़ल्ट।
- पिक लिस्ट और सर्च डायग्नोसिस और दवाइयों के लिए, जो भीतर ही भीतर मानक कोड से जुड़े हों, ताकि डॉक्टर “टाइप 2 डायबिटीज़” चुनें और रिकॉर्ड में उसका कोड दर्ज हो।
- रेंज जांच जो रोके नहीं, बस चेताए। सामान्य दायरे से बाहर के मान पर निशान लगना चाहिए, और दशमलव की संभावित चूक का सुधार सुझाया जाना चाहिए, लेकिन सचमुच का कोई चरम मान भी दर्ज किया जा सकना चाहिए। जिस जांच को आपात स्थिति दर्ज करने के लिए दरकिनार करना पड़े, उसे आदतन दरकिनार किया जाने लगता है।
- रजिस्ट्रेशन के समय डुप्लिकेट की जांच। अगर कोई फ़ोन नंबर पहले से किसी मरीज़ का है, तो नया रिकॉर्ड बनाने से पहले पूछें कि क्या यह वही व्यक्ति है।
- साफ़-साफ़ ‘नहीं’। “कोई ज्ञात एलर्जी नहीं” एक अलग विकल्प के रूप में, जो ख़ाली फ़ील्ड से अलग हो।
- ऐसे सुधार जो निशान छोड़ें। जब कोई रिकॉर्ड ग़लत हो, तो उसके ऊपर लिखने के बजाय कारण के साथ उसे सुधारें और मूल रिकॉर्ड को रखें। यही निशान बाक़ी चीज़ों पर भरोसा करने देता है।
- सीमाओं पर मानक। LOINC में कोड किए गए लैब रिज़ल्ट, FHIR के रूप में आदान-प्रदान होने वाला डेटा, और बाहर जाने से पहले उसकी जांच।
डेटा की गुणवत्ता और AI
AI अपनी ओर से दो समस्याएं और जोड़ता है।
पहली यह कि मॉडल को वही विरासत में मिलता है जो उसके ट्रेनिंग डेटा (training data) में होता है। अगर कुछ मरीज़ों के बारे में कम दर्ज होता है, या कुछ डायग्नोसिस ढीले ढंग से कोड होते हैं, तो मॉडल वही कमियां सीख लेता है।
दूसरी यह कि एक अस्पताल के डेटा पर बना मॉडल दूसरे अस्पताल के डेटा पर विफल हो सकता है। इसका एक जाना-माना उदाहरण सेप्सिस (sepsis) का अनुमान लगाने वाला एक मॉडल है, जो अमेरिका (US) के कई अस्पतालों में इस्तेमाल होता है: Michigan Medicine में अस्पताल में भर्ती रहने के 38,455 मामलों पर जांचने पर, इसने सेप्सिस के 67% मामले नहीं पकड़े, जबकि सभी मरीज़ों में से 18% पर चेतावनी दी। इसकी एक वजह डेटा की गुणवत्ता है: चीज़ें कैसे और कब दर्ज की जाती हैं, इसमें फ़र्क से बदल जाता है कि मॉडल को क्या दिखता है।
इसलिए किसी भी AI टूल पर भरोसा करने से पहले पूछें कि उसे किस डेटा पर बनाया और परखा गया था, और उसे अपने रिकॉर्ड के एक नमूने पर परखें। और इस्तेमाल शुरू होने (गो-लाइव) के बाद भी मापते रहें, क्योंकि दर्ज करने की आदतें बदलती हैं।
डेटा की गुणवत्ता की चेकलिस्ट
- क्या आपने वे फ़ील्ड चुन लिए हैं जो आपके सोचे हुए उपयोग के लिए मायने रखते हैं?
- क्या आप जानते हैं कि आज उनमें से हर एक कितना पूरा है?
- क्या डायग्नोसिस ICD-10 में कोड होते हैं, और लैब टेस्ट LOINC से जुड़े हैं?
- क्या रेंज जांच अविश्वसनीय मानों पर चेतावनी देती हैं, और दशमलव की संभावित चूक का सुधार सुझाती हैं?
- क्या रजिस्ट्रेशन के समय डुप्लिकेट मरीज़ की जांच होती है?
- क्या “कुछ नहीं” को “पूछा नहीं गया” से अलग, साफ़ तौर पर दर्ज किया जा सकता है?
- क्या सुधार कारण के साथ, मूल रिकॉर्ड को रखते हुए किए जाते हैं?
- क्या इस साल किसी ने कोड किए गए डायग्नोसिस के एक नमूने को नोट्स से मिलाकर जांचा है?
- क्या डेटा साझा करने से पहले उसकी जांच होती है (उदाहरण के लिए FHIR के आधार पर)?
- क्या आप माप तय समय पर दोहराते हैं, और क्या नतीजों की ज़िम्मेदारी किसी के पास है?
92health कहां फ़िट होता है
92health एक EMR और AI प्लेटफ़ॉर्म है, जिसे भारत में क्लिनिक, अस्पताल, फ़ार्मेसी, लैब और ऑप्टिकल शॉप इस्तेमाल करते हैं। ऊपर की चेकलिस्ट का बड़ा हिस्सा इसके इलाज दर्ज करने के तरीके में ही शामिल है:
- डायग्नोसिस खोजी जा सकने वाली सूचियों से चुने जाते हैं और अपने ICD-10 कोड के साथ सहेजे जाते हैं;
- आंखों की प्रारंभिक जांच (वर्क-अप) में, सामान्य दायरे से बाहर की रीडिंग पर निशान लगता है, और दशमलव की संभावित चूक का सुधार सुझाया जाता है, लेकिन सचमुच के चरम मान को रोका नहीं जाता;
- अगर कोई ऐसा फ़ोन नंबर रजिस्टर किया जाए जो पहले से किसी मरीज़ का है, तो दूसरा रिकॉर्ड बनाने से पहले पूछा जाता है कि क्या यह वही व्यक्ति है;
- लैब रिज़ल्ट साझा करने से पहले FHIR R4 के रूप में उनकी जांच होती है;
- ग़लती से दर्ज डायग्नोसिस को मिटाया नहीं जाता, बल्कि कारण के साथ वापस लिया जाता है, और काग़ज़ से बाद में दर्ज किए गए रिकॉर्ड पर इसी बात का निशान लगाया जाता है।
जो अस्पताल जानना चाहते हैं कि वे कहां खड़े हैं, उनके लिए हम अपने AI की तैयारी के काम के हिस्से के रूप में डेटा की गुणवत्ता की समीक्षा करते हैं: आपके रिकॉर्ड का एक नमूना, ऊपर दी गई जांचों के आधार पर मापा जाता है, और सबसे पहले क्या ठीक करना है, इसकी एक लिखित सूची दी जाती है।
स्रोत
- Weiskopf NG, Weng C. Methods and dimensions of electronic health record data quality assessment: enabling reuse for clinical research. JAMIA, 2013;20(1):144-151. doi:10.1136/amiajnl-2011-000681
- Kahn MG et al. A harmonized data quality assessment terminology and framework for the secondary use of electronic health record data. eGEMs, 2016;4(1):1244. doi:10.13063/2327-9214.1244
- Burns EM et al. Systematic review of discharge coding accuracy. Journal of Public Health, 2012;34(1):138-148. doi:10.1093/pubmed/fdr054
- Srinivasan K et al. The final diagnosis: evaluating errors in cause-of-death reporting. Cureus, 2025;17:e82785. doi:10.7759/cureus.82785
- Wong A et al. External validation of a widely implemented proprietary sepsis prediction model in hospitalized patients. JAMA Internal Medicine, 2021. doi:10.1001/jamainternmed.2021.2626
आम सवाल
- क्लिनिकल डेटा की गुणवत्ता क्या है?
- किसी मरीज़ के रिकॉर्ड पर सामने के काम के लिए कितना भरोसा किया जा सकता है: जो जानकारी होनी चाहिए वह है या नहीं, वह सही है या नहीं, वह आपस में और दूसरे स्रोतों से मेल खाती है या नहीं, वह समझ में आती है या नहीं, और वह अद्यतन (अप-टू-डेट) है या नहीं।
- EHR डेटा की गुणवत्ता कैसे मापी जाती है?
- जिस उपयोग को आप ध्यान में रखे हुए हैं, उसके लिए ज़रूरी फ़ील्ड चुनें, फिर मापें: वे कितनी बार भरे होते हैं, कितनी बार तय फ़ॉर्मेट और कोड सेट का पालन करते हैं, कितनी बार मान (वैल्यू) संभव दायरे से बाहर जाते हैं, कितने मरीज़ों के रिकॉर्ड दोहराए गए हैं, और कोड किए गए डायग्नोसिस का एक नमूना केस नोट्स से कितना मेल खाता है।
- अस्पतालों में डायग्नोसिस की कोडिंग कितनी सटीक होती है?
- इसमें बहुत अंतर होता है। ब्रिटेन (UK) के 32 अध्ययनों की एक व्यवस्थित समीक्षा (systematic review) में पाया गया कि केस नोट्स से मिलाने पर डायग्नोसिस कोडिंग की माध्यिका (median) सटीकता 80.3% थी, और अलग-अलग अध्ययनों में यह 50% से 98% तक थी। कोडिंग की सटीकता तब सुधरती है जब कोई उस पर निर्भर करता है और उसकी जांच करता है।
- AI के लिए डेटा की गुणवत्ता क्यों मायने रखती है?
- AI रिकॉर्ड से पैटर्न सीखता है और जो पढ़ता है उसी के आधार पर काम करता है। छूटा हुआ या ग़लत डेटा पूरे भरोसे के साथ दिए गए ग़लत जवाब पैदा करता है, और एक अस्पताल के डेटा पर बना मॉडल दूसरे अस्पताल के डेटा पर विफल हो सकता है। साफ़, मानक और अच्छी तरह प्रलेखित डेटा ही किसी टूल को काम करने लायक बनाता है, और आपको यह जांचने देता है कि वह सचमुच काम कर रहा है।
- डेटा को दर्ज करने के बाद साफ़ करना चाहिए या दर्ज करते समय ही?
- जहां तक हो सके, दर्ज करते समय ही। स्ट्रक्चर्ड फ़ील्ड, पिक लिस्ट (चुनने की सूची), रेंज जांच और रजिस्ट्रेशन के समय डुप्लिकेट की जांच ऐसी ग़लतियों को रोकती हैं जिन्हें बाद में ठीक करना महंगा या नामुमकिन होता है, क्योंकि तब तक किसी को याद नहीं रहता कि सही मान क्या था।
यह लेख भारत के पाठकों के लिए स्वास्थ्य से जुड़ी सामान्य जानकारी है। यह कोई निदान, दवा का पर्चा या डॉक्टर से सलाह का विकल्प नहीं है। खर्च, इलाज के तरीके और नियम हर क्लिनिक और राज्य में अलग होते हैं; जो भी बात ज़रूरी हो, उसकी पुष्टि अपने डॉक्टर या फ़ार्मासिस्ट से करें।